वो चाँदनी का बदन ख़ुशबुओं का साया है बहुत अज़ीज़ हमें है मगर पराया है उतर भी आओ कभी आसमाँ…
वो चाँदनी का बदन ख़ुशबुओं का साया है बहुत अज़ीज़ हमें है मगर पराया है …
या रब वो न समझे हैं न समझेंगे मेरी बातदे और दिल…
बैठा है मेरे सामने वो जाने किसी सोच में पड़ा है अच्छी आँखें मिली…
ग़ालिब को मुख्यतः उनकी उर्दू ग़ज़लों को लिए याद किया जाता आज।…


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